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हर जीव का मोल: पुराने समय की बात है, भारत के एक बहुत ही सुंदर और समृद्ध राज्य 'सुमेरपुर' में महाराज भवानी सिंह राज करते थे। भवानी सिंह बहुत ही शूरवीर और ताकतवर राजा (King) - विकिपीडिया थे। उनके खजाने में धन की कोई कमी नहीं थी और उनकी सेना बहुत विशाल थी। लेकिन महाराज में एक छोटी सी कमी थी—उन्हें लगता था कि इस दुनिया में सिर्फ बड़ी और ताकतवर चीजें ही काम की होती हैं।
एक दिन महाराज भवानी सिंह ने अपने दरबार में सभी विद्वानों और मंत्रियों को बुलाया। उन्होंने एक अजीब सा फरमान सुनाया, "मैं चाहता हूँ कि इस पूरी धरती पर खोज की जाए कि ऐसे कौन से जीव-जंतु हैं जिनका हमारे जीवन में कोई उपयोग नहीं है। जो जीव बिल्कुल बेकार हैं, उन्हें हमारे राज्य से हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए, ताकि वे बेवजह की जगह न घेरें।"
सभी मंत्री इस अजीब आदेश से हैरान थे, लेकिन महाराज की बात टालने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
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बेकार जीवों की खोज: मक्खी और मकड़ी
महीनों तक पूरे राज्य में खोजबीन चली। बड़े-बड़े पोथे पढ़े गए और अंत में राजवैद्य और मंत्रियों ने एक सूची बनाई। महामंत्री ने दरबार में आकर सिर झुकाते हुए कहा, "महाराज! बहुत खोजबीन के बाद हमने पाया है कि इस संसार में दो जीव बिल्कुल बेकार हैं। पहली है 'जंगली मक्खी' (Wild Fly), जो सिर्फ भिनभिनाती है और डंक मारती है। और दूसरी है 'मकड़ी' (Spider), जो घरों और पेड़ों पर गंदे जाले बुनती है। इनका मनुष्य के लिए कोई उपयोग नहीं है।"
महाराज भवानी सिंह यह सुनकर बहुत खुश हुए। उन्होंने मूंछों पर ताव देते हुए कहा, "बहुत बढ़िया! कल सुबह से ही राज्य के हर कोने से इन जंगली मक्खियों और मकड़ियों को खत्म करने का अभियान शुरू किया जाए।"
महाराज को यह बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि हर जीव का मोल इस प्रकृति ने तय किया है, और कोई भी चीज़ बेकार नहीं होती।
क्रूर सिंह का अचानक हमला
प्रकृति के खेल भी बड़े निराले होते हैं। अभी महाराज भवानी सिंह का आदेश लागू भी नहीं हुआ था कि उसी रात उनके पड़ोसी राज्य के लालची और निर्दयी राजा 'क्रूर सिंह' ने सुमेरपुर पर अचानक हमला कर दिया।
क्रूर सिंह की सेना बहुत बड़ी थी और उन्होंने रात के अंधेरे में धोखा देकर किले के दरवाजे तोड़ दिए। भवानी सिंह की सेना इस अचानक हुए हमले के लिए तैयार नहीं थी। युद्ध के मैदान में भवानी सिंह ने बहुत बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन उनकी सेना कम पड़ने लगी।
अपने राज्य को बचाने और दोबारा सेना खड़ी करने के लिए, महाराज भवानी सिंह को अपनी जान बचाकर वहां से भागना पड़ा। वे अपने घोड़े पर सवार होकर पास के एक बेहद घने और डरावने 'नीलगिरी जंगल' की तरफ निकल गए। क्रूर सिंह के सैनिक नंगी तलवारें लेकर उनका पीछा कर रहे थे।
थकावट और जंगली मक्खी का डंक
महाराज भवानी सिंह लगातार कई घंटों तक भागते रहे। उनका घोड़ा भी थक कर गिर गया था। अब महाराज पैदल ही कंटीली झाड़ियों के बीच से भाग रहे थे। उनके शाही कपड़े फट चुके थे और वे बुरी तरह थक चुके थे।
आखिरकार, चलते-चलते महाराज की हिम्मत जवाब दे गई। वे एक घने आम के पेड़ के नीचे जाकर गिर पड़े और उन्हें गहरी नींद आ गई। वे इतने थके हुए थे कि अगर कोई उन्हें उठाता भी, तो वे नहीं उठते।
उसी समय, क्रूर सिंह के सैनिक खोजी कुत्तों के साथ उसी रास्ते पर आ रहे थे। अगर महाराज भवानी सिंह वहां सोते रहते, तो सैनिक उन्हें पकड़ कर मार डालते।
तभी वहां एक अजीब सी घटना घटी। पेड़ की डाल पर बैठी एक 'जंगली मक्खी' नीचे आई। वह सीधे महाराज भवानी सिंह की नाक पर जा बैठी और उसने ज़ोर से एक डंक मार दिया! आउच! डंक के तेज दर्द से महाराज की आँखें अचानक खुल गईं। वे गुस्से में तिलमिला उठे, "इस तुच्छ मक्खी की इतनी हिम्मत!"
लेकिन जैसे ही वे उठे, उन्हें दूर से घोड़ों की टापों और सैनिकों की आवाज़ें सुनाई दीं। महाराज तुरंत समझ गए कि अगर यह मक्खी उन्हें डंक मारकर न जगाती, तो दुश्मन उन्हें सोते हुए ही पकड़ लेते। उन्होंने मन ही मन उस 'बेकार' जंगली मक्खी को धन्यवाद दिया और अपनी जान बचाने के लिए आगे की तरफ भागने लगे।
गुफा और मकड़ी के जाले का चमत्कार
भागते-भागते महाराज भवानी सिंह एक अंधेरी और पुरानी गुफा के पास पहुँचे। उन्होंने सोचा कि इसके अंदर छिपना ही सबसे सुरक्षित रहेगा। वे जल्दी से गुफा के अंदर गए और एक बड़े पत्थर के पीछे छिपकर अपनी सांसें रोक कर बैठ गए।
महाराज के गुफा में जाने के कुछ ही देर बाद, उस गुफा के प्रवेश द्वार पर रहने वाली बहुत सारी छोटी-बड़ी मकड़ियों ने अपना काम शुरू कर दिया। उन मकड़ियों ने बड़ी तेज़ी से गुफा के द्वार पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक बहुत ही घना और बड़ा जाला (Spider Web) बुन दिया।
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कुछ ही मिनटों बाद, क्रूर सिंह के सैनिक महाराज को ढूंढते हुए उसी गुफा के ठीक बाहर आ पहुँचे। सैनिकों के सेनापति ने गुफा को देखा और अपनी तलवार निकाली। एक सिपाही ने कहा, "सेनापति जी, मुझे लगता है राजा भवानी सिंह इसी गुफा के अंदर छिपे हुए हैं। हमें अंदर जाकर देखना चाहिए।"
सेनापति गुफा के द्वार के पास गया। तभी उसकी नज़र वहां फैले हुए घने मकड़ी के जालों पर पड़ी, जो हवा में झूल रहे थे। सेनापति ज़ोर से हँसा और बोला, "अरे मूर्ख! थोड़ा अपना दिमाग लगाओ। देखो, इस गुफा के दरवाजे पर कितना घना मकड़ी का जाला बुना हुआ है। अगर भवानी सिंह इसके अंदर गया होता, तो क्या यह जाला टूट नहीं जाता? यह जाला बिल्कुल साबुत है। इसका मतलब यहाँ कई दिनों से कोई इंसान नहीं आया है। चलो, आगे किसी और रास्ते पर ढूंढते हैं।"
असली ज्ञान: कोई बेकार नहीं
सेनापति की यह बात सुनकर सारे सैनिक वहां से वापस लौट गए। गुफा के अंदर पत्थर के पीछे छिपे महाराज भवानी सिंह यह सब सुन रहे थे। उनके रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्हें अपने उस घमंडी फैसले पर बहुत शर्म आई, जिसमें उन्होंने जंगली मक्खियों और मकड़ियों को 'बेकार' कहकर मरवाने का आदेश दिया था। उन्होंने आसमान की तरफ हाथ जोड़कर कहा, "हे ईश्वर! मुझे माफ कर दीजिए। मैं भूल गया था कि आपकी बनाई हुई इस दुनिया में हर जीव का मोल है। आज जिन दो जीवों को मैंने सबसे तुच्छ और बेकार समझा था, उन्हीं 'जंगली मक्खी' और 'मकड़ी' ने मेरी जान बचाई है।"
कुछ दिनों बाद, भवानी सिंह ने अपनी सेना को दोबारा इकट्ठा किया, क्रूर सिंह को युद्ध में हराया और अपना राज्य वापस ले लिया। लेकिन अब वे एक बदले हुए राजा थे। उन्होंने ऐलान कर दिया कि सुमेरपुर राज्य में किसी भी छोटे से छोटे जीव को बिना वजह नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।
इस जंगल की कहानी से सीख (Moral of the Story):
अहंकार न करें: हमें कभी भी अपने आकार या ताकत पर घमंड नहीं करना चाहिए और किसी को खुद से छोटा नहीं समझना चाहिए।
प्रकृति का महत्व: भगवान की बनाई इस दुनिया में कोई भी चीज़ या प्राणी बेकार नहीं है। हर किसी का अपना एक विशेष महत्व होता है।
सही समय पर बुद्धि: मुसीबत के समय हमें हमेशा सचेत रहना चाहिए, जैसे राजा ने मक्खी के डंक के दर्द के बावजूद खतरे को पहचान लिया।
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